झाबुआ। 02 जुलाई को शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास अपना स्थापना दिवस “भारतीय शिक्षा दिवस” के रूप में मना रहा है। यह केवल एक दिवस का औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा के मूल स्वरूप को पुनः प्रतिष्ठित करने का संकल्प दिवस है। आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक शिक्षण संस्थान अपने दैनिक जीवन, शिक्षण पद्धति और परिसर की संस्कृति में भारतीयता का समावेश करने का ठोस प्रयास करे।
भारतीय शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसे चरित्रवान, संवेदनशील, आत्मनिर्भर और राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों का निर्माण करना है जो अपने ज्ञान का उपयोग समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए करें। इसलिए भारतीयता केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रहे, बल्कि विद्यालय के प्रत्येक कार्य और व्यवहार में दिखाई दे।
यदि किसी विद्यालय की प्रार्थना भारतीय जीवन मूल्यों का संदेश देती है, संस्थान देश के नाम के रूप में “भारत” का प्रयोग करता है, अंग्रेजी में भी Bharat लिखता है, भारतीय पंचांग का नियमित उपयोग करता है, छात्र उपस्थिति के समय “जय भारत”, “जय हिन्द” अथवा अन्य भारतीय अभिवादन करते हैं, तो यह केवल प्रतीकात्मक परिवर्तन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का संस्कार है।
संस्थान की नामपट्टिकाएँ भारतीय भाषाओं में हों, उपस्थिति पंजी में शिक्षक मातृभाषा में हस्ताक्षर करें, भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान का वातावरण बने तथा विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषा के साथ कम-से-कम एक अन्य भारतीय भाषा सीखने के लिए प्रेरित किया जाए। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और सभ्यता की वाहक भी होती है।
भारतीय शिक्षा प्रकृति के साथ सहअस्तित्व की शिक्षा देती है। इसलिए विद्यालय परिसर में पक्षियों के लिए दाना-पानी, गौसेवा हेतु प्रतिदिन रोटी संग्रह की व्यवस्था, वर्षभर वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, जल संरक्षण तथा अतिथियों को आवश्यकता अनुसार आधा गिलास जल देने जैसी छोटी-छोटी व्यवस्थाएँ विद्यार्थियों में पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करती हैं। कूड़ा पृथक्करण और निस्तारण की व्यवस्था, अनुपयोगी कागज़ से पेपरमैशी के माध्यम से खिलौने, मूर्तियाँ और उपयोगी वस्तुएँ बनाना भी पर्यावरण संरक्षण और कौशल विकास का उत्कृष्ट उदाहरण है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की आधारशिला है। विद्यालयों में प्रायोगिक शिक्षा, कौशल विकास, स्थानीय कला, शिल्प और पारंपरिक व्यवसायों का परिचय, वैदिक गणित का शिक्षण तथा विद्यार्थियों का 360 डिग्री समग्र मूल्यांकन भारतीय शिक्षा की दिशा को सुदृढ़ बनाते हैं। विद्यार्थियों के लिए संवाद एवं विमर्श केंद्र स्थापित करना भी आवश्यक है, जहाँ वे स्वतंत्र रूप से अपने विचार व्यक्त कर सकें और समस्याओं पर चर्चा कर समाधान खोजने का अभ्यास करें।
विद्यालयों में भारतीय ऋषियों, वैज्ञानिकों, महापुरुषों और राष्ट्रनिर्माताओं के चित्र एवं उनके प्रेरक बोधवाक्य प्रदर्शित हों। सामाजिक समरसता के कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाएँ। बच्चों में बचत की आदत विकसित करने हेतु गुल्लक वितरण जैसे अभियान चलाए जाएँ तथा समाज की सहभागिता से सेवा और संस्कार आधारित गतिविधियों का विस्तार किया जाए। शिक्षक केवल विषय विशेषज्ञ न रहें, बल्कि चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व विकास के प्रेरक बनें। इसके लिए प्रत्येक वर्ष शिक्षकों का विशेष प्रशिक्षण आयोजित किया जाना चाहिए।
एक आदर्श शिक्षण संस्थान अपने आसपास के समाज से भी जुड़ा होता है। स्थानीय सामाजिक समस्याओं की जानकारी, उनके समाधान के लिए विद्यार्थियों और समाज के साथ सामूहिक प्रयास तथा जनभागीदारी भारतीय शिक्षा की वास्तविक पहचान है।
आज आवश्यकता केवल भारतीय शिक्षा पर चर्चा करने की नहीं, बल्कि उसे व्यवहार में उतारने की है। भारतीय शिक्षा दिवस हमें यही संदेश देता है कि प्रत्येक शिक्षण संस्थान ज्ञान का केंद्र होने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व और आत्मनिर्भरता का भी केंद्र बने।
02 जुलाई का यह स्थापना दिवस तभी सार्थक होगा, जब प्रत्येक शिक्षण संस्थान एक संकल्प ले—“हम केवल शिक्षा नहीं देंगे, बल्कि भारतीयता से युक्त शिक्षा देंगे; केवल विद्यार्थी नहीं बनाएँगे, बल्कि संस्कारित, सक्षम, संवेदनशील और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक तैयार करेंगे।”
— ओमप्रकाश शर्मा
राष्ट्रीय सह-संयोजक
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास
